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विधिक सेवा शिविर का आयोजन, 4316 लाभार्थियों को मिली सरकारी योजनाओं की सौगात

मैनपुरी जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देशन में पुलिस लाइन में आयोजित वृहद विधिक सहायता एवं सेवा शिविर में विभिन्न लाभार्थीपरक योजनाओं के 4316 लाभार्थियों को सहायता उपकरण, ऋण स्वीकृति पत्र, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आवास योजना के लाभार्थियों को आवास की प्रतीकात्मक चाबी उपलब्ध कराते हुए जिला जज रुपेश रंजन ने कहा कि शिविर का मुख्य उद्देश्य जन-सामान्य को निःशुल्क विधिक सहायता परामर्श एवं विभिन्न विभागों की जन-कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी तथा पात्र लाभार्थियों को योजनाओं का लाभ प्रदान किया जाना है। उन्होंने कहा कि किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, यदि गरीब, वंचित एवं पात्र वर्गों को उनके अधिकारों और योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता, तो न्याय की अवधारणा अधूरी रह जाती है, इसी उद्देश्य से जिला विधिक सेवा प्राधिकरण निरंतर कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम के दौरान जिलाधिकारी का एक साहित्यिक एवं संवेदनशील व्यक्तित्व भी सामने आया, जिसमें न्याय और समाज के प्रति गहरी संवेदना दिखाई दी। उन्होंने जिलाधिकारी द्वारा व्यक्त उस विचार का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि व्यक्ति की अंतरात्मा जागृत हो तो अनेक विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं, यह विचार समाज में न्यायिक चेतना विकसित करने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया की वास्तविकताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अक्सर न्यायिक अधिकारी को प्रारंभिक स्तर पर ही यह आभास हो जाता है कि किस पक्ष की स्थिति मजबूत है, किंतु न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि निर्णय केवल साक्ष्यों और विधिक प्रक्रियाओं के आधार पर ही दिया जाता है, न्यायिक अधिकारी व्यक्तिगत धारणा या अनुभव के आधार पर नहीं बल्कि कानून और प्रमाणों के आधार पर निर्णय देता है, यही न्यायपालिका की निष्पक्षता और विश्वसनीयता का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि न्यायिक अधिकारी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह सभी प्रकार के व्यक्तिगत संबंधों और सामाजिक प्रभावों से दूर रहकर न्याय प्रदान करे, न्यायालय के आसन पर बैठते समय उसके लिए सभी व्यक्ति समान होते हैं, चाहे वह परिचित हो या अपरिचित यही न्यायिक व्यवस्था की गरिमा और उसकी निष्पक्षता को स्थापित करता है। उन्होंने समाज में बढ़ते छोटे-छोटे विवादों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि राजस्व एवं भूमि संबंधी अनेक मुकदमे अत्यंत छोटे मुद्दों से जुड़े होते हैं, जिन्हें आपसी समझ और मध्यस्थता से समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि विधिक सेवा प्राधिकरण ऐसे विवादों के समाधान हेतु मध्यस्थता और समझौता प्रक्रिया को बढ़ावा देता है, पंच परमेश्वर जैसी परंपरागत अवधारणाएं आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनका मूल उद्देश्य निष्पक्ष एवं सामाजिक न्याय स्थापित करना था, वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में भी मध्यस्थता के माध्यम से विवादों को शीघ्र समाप्त करने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि न्यायिक प्रणाली द्वारा लंबित पुराने मामलों के निस्तारण हेतु विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं, उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप आने वाले समय में मुकदमों की लंबित संख्या में उल्लेखनीय कमी आएगी और न्याय अधिक त्वरित रूप से उपलब्ध हो सकेगा, न्यायिक अधिकारी पूरी निष्ठा एवं लगन के साथ इस दिशा में कार्य कर रहे हैं और इसका प्रभाव भविष्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह ने कहा कि आज भी आम ग्रामीण व्यक्ति को न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं की पर्याप्त जानकारी नहीं है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि शिक्षित होने के बावजूद प्रारंभिक समय में उन्हें भी न्यायिक प्रणाली की कार्यप्रणाली की सीमित जानकारी थी, ऐसे में सामान्य ग्रामीण नागरिक के लिए न्याय प्राप्ति की प्रक्रिया को समझना और भी कठिन हो जाता है। उन्होंने कहा कि कई बार लोगों को यह तक ज्ञात नहीं होता कि अन्याय होने पर उन्हें कहां और कैसे जाना चाहिए। उन्होने कहा कि समाज में यह धारणा भी प्रचलित रही है कि न्याय प्राप्त करना महंगा और लंबी प्रक्रिया वाला कार्य है, अनेक मामलों में लोग वर्षों तक मुकदमे लड़ते रहते हैं और न्याय मिलने में पीढ़ियां बीत जाती हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या अधिक होने का एक कारण यह भी है कि कई विवाद ऐसे होते हैं, जिन्हें सामाजिक स्तर पर ही सुलझाया जा सकता था, किंतु वह अनावश्यक रूप से न्यायालय तक पहुंच जाते हैं। उन्होंने कहा कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण का दायित्व केवल योजनाओं की जानकारी देना ही नहीं बल्कि न्याय को सस्ता, सुलभ और त्वरित बनाना भी है, इसके लिए वैकल्पिक विवाद निस्तारण, लोक अदालतों तथा ग्राम स्तर पर समझौता आधारित समाधान को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने प्रसिद्ध कहानी “पंच परमेश्वर” का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय समाज की परंपराओं में न्याय की गहरी भावना निहित रही है और पंचायत व्यवस्था सामाजिक न्याय का प्रभावी माध्यम हुआ करती थी, ऐसे मूल्यों का पुनः प्रसार कर समाज में न्याय के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और यदि गांव स्तर पर सामाजिक जागरूकता बढ़े तथा गलत दावों एवं अनावश्यक मुकदमों को हतोत्साहित किया जाए, तो न्यायालयों पर भार स्वतः ही कम हो सकता है। उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से बताया कि जब न्याय की उपेक्षा होती है और समझौते के अवसर खो दिए जाते हैं, तब विवाद बड़े संघर्ष का रूप ले लेते हैं, छोटे-छोटे भूमि विवादों को लेकर वर्षों तक मुकदमेबाजी समाज और परिवार दोनों के लिए हानिकारक है, इसलिए समय रहते समाधान की संस्कृति विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने सभी प्रतिभागियों से आह्वान किया कि कार्यक्रम में प्राप्त जानकारी को अपने गांव और समाज तक पहुंचाएं ताकि अधिक से अधिक लोग विधिक सहायता योजनाओं का लाभ उठा सकें। पुलिस अधीक्षक गणेश प्रसाद शाहा ने अपने सम्बोधन में कहा कि यह आयोजन अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर केंद्रित है, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों को न्याय व्यवस्था, विधिक सहायता तथा जन-कल्याणकारी व्यवस्थाओं से सीधे जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, कार्यक्रम में लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभ न्यायपालिका, प्रशासन और पुलिस एक मंच पर उपस्थित हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि शासन की समस्त संस्थाएं मिलकर नागरिकों को न्याय एवं सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता से पूर्व जिस राज्य की परिकल्पना की गई थी, वह एक कल्याणकारी राज्य की थी, जहां सामाजिक असमानता कम हो, आर्थिक अंतर सीमित हो तथा प्रत्येक नागरिक को न्याय प्राप्त हो, न्याय केवल उपलब्ध ही न हो बल्कि सहज, पारदर्शी और सुलभ भी हो, यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल उद्देश्य रहा है। उन्होंने कहा कि विधिक सेवा प्राधिकरण का संचालन मा. सर्वाेच्च न्यायालय के मार्गदर्शन एवं निगरानी में किया जाता है, जिसके अंतर्गत राज्य, जिला स्तर तक इसका विकेंद्रीकरण किया गया है ताकि न्याय व्यवस्था आमजन के और अधिक निकट पहुंच सके। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल त्वरित निर्णय देना नहीं है बल्कि न्याय को व्यक्ति के जीवन का सहज हिस्सा बनाना है, न्याय तभी सार्थक है, जब वह आम नागरिक के घर तक पहुंचे और समाज का प्रत्येक वर्ग उसका लाभ उठा सके, इसके लिए आवश्यक है कि लोगों को विधिक अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया जाए। उन्होंने कहा कि जागरूकता की राह में कई प्रकार की बाधाएं होती हैं, कई बार शिक्षा का स्तर सीमित होने के कारण लोग कानूनी शब्दावली को समझ नहीं पाते, कभी दूरी और संसाधनों की कमी बाधा बनती है, तो कभी पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण लोग न्यायिक संस्थानों तक नहीं पहुंच पाते, ऐसे में आवश्यक है कि संस्थाएं स्वयं लोगों तक पहुंचें, विधिक सेवा प्राधिकरण की मूल भावना भी यही है कि न्याय नागरिक के पास जाए, न कि नागरिक को न्याय तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़े, विशेष रूप से महिलाओं, समाज के कमजोर वर्ग जो आर्थिक, सामाजिक या मानसिक कारणों से न्याय प्राप्त नहीं कर पाते, न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया की लागत और जटिलता भी कई बार लोगों को पीछे हटने पर मजबूर कर देती है। उन्होंने कहा कि पूर्व में लोगों के मन में न्यायालयों को लेकर भय और संकोच की भावना रहती थी, जहां यह धारणा थी कि न्याय पाने में वर्षों लग जाएंगे हालांकि समय के साथ व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन आए हैं और न्याय प्रणाली अधिक संवेदनशील एवं जनोन्मुखी हुई है। उहोंने कहा कि योजनाओं और विधिक सेवाओं की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि लोग स्वयं संस्थाओं तक पहुंचें, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि संस्थाएं किस हद तक लक्षित वर्ग तक पहुंचकर उन्हें जागरूक कर पाती हैं, इसके लिए जमीनी स्तर पर अध्ययन, स्थानीय परिस्थितियों की समझ और सरल भाषा में संवाद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जनसुनवाई के दौरान अक्सर महिलाएं और बुजुर्ग अपनी स्थानीय भाषा में अपनी समस्याएं बताते हैं, इसलिए अधिकारियों, कर्मचारियों को संवेदनशील होकर उनकी भाषा और परिस्थितियों को समझना चाहिए, संवाद तभी सफल होगा जब हम सुनने की संस्कृति विकसित करेंगे और लोगों की वास्तविक समस्याओं को समझेंगे, न्याय और योजनाओं की वास्तविक सफलता तभी संभव है, जब अधिकारी गांवों तक पहुंचें, योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा करते समय यह समझना आवश्यक है कि जटिलताओं को किस स्तर पर कम किया जा सकता है, ताकि आम नागरिक बिना कठिनाई के लाभ प्राप्त कर सके उन्होंने कहा कि अधिकांश विवाद परिवार और पड़ोस से जुड़े होते हैं, इसलिए समाज में शांति और संवाद की संस्कृति विकसित करना आवश्यक है। पुलिस विभाग की भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही पुलिस की प्रत्यक्ष योजनाएं कम दिखाई दें, लेकिन समाज में सुरक्षित वातावरण बनाए रखना सभी योजनाओं की सफलता की आधारशिला है, पुलिस विभाग 24 घंटे नागरिकों की सुरक्षा और सहयोग के लिए तत्पर रहता है, महिलाओं की सुरक्षा और सहायता के लिए मिशन शक्ति केंद्र प्रत्येक थाने पर स्थापित किए गए हैं तथा तहसील स्तर पर परिवार परामर्श केंद्र संचालित किए जा रहे हैं, जिससे लोगों को दूरस्थ मुख्यालयों तक जाने की आवश्यकता कम हो। जिला जज, जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, न्यायिक अधिकारियों ने सी.एम. युवा के 04 लाभार्थियों को रू. 20 लाख के ऋण स्वीकृति पत्र, जिला विकास विभाग के 03, समाज कल्याण विभाग के 13, दिव्यांग सशक्तीकरण विभाग के 07, कृषि एवं वानिकी विभाग के 02, पंचायतीराज विभाग के 06, बैंक सहायता एवं ऋण विभाग से 03, पशुपालन विभाग के 15, दुग्ध विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, औद्योगिक विभाग, कौशल विकास विभाग, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, उद्यान विभाग केे 05-05, मत्स्य पालन विभाग के 06, राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास के 40, जिला नगरीय विकास अभिकरण डूडा, जिला प्रोबेशन अधिकारी के 10-10, खाद्य सुरक्षा एवं रसद विभाग के 04 लाभार्थियों को लाभान्वित किया गया। वृहद सहायता शिविर में बेसिक शिक्षा, नमामि गंगे एवं ग्रामीण जलापूर्ति, जिला नगरीय विकास डूडा, बैंक ऑफ़ इंडिया, मिशन शक्ति फेज-5.0, जिला कारागार में निरुद्ध बंदियों द्वारा तैयार किया गया तरकाशी शिल्प कला, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, मत्स्य, उद्यान, पंचायत राज, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, सामाजिक वानिकी प्रभाग, युवा कल्याण, समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास पुष्टाहार, महिला कल्याण विभाग, उद्योग एवं प्रोत्साहन आदि विभागों के द्वारा स्टॉल लगाकर आमजन को विभागीय योजनाओं की जानकारी के साथ पात्र होने की दशा में किस प्रकार योजना का लाभ प्राप्त करें, के बारे में जानकारी प्रदान की गयी। इस दौरान प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय देवराज प्रसाद सिंह, अपर जिला जज अच्छे लाल सरोज, सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण प्रीती गिरी, विशेष न्यायाधीश, नोडल अधिकारी राष्ट्रीय लोक अदालत सत्येन्द्र नाथ त्रिपाठी, विशेष न्यायाधीश जय प्रकाश, अपर जनपद न्यायाधीश पॉस्को जितेन्द्र मिश्रा, विशेष न्यायाधीश ईसीएक्ट राकेश पटेल, अपर जनपद न्यायाधीश जहेन्द्र पाल सिंह, स्वप्नदीप सिंघल, चेतना चौहान, कुलदीप सिंह तृतीय, कमल सिंह, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विमलेश सरोज, सिविल जज सी.डि. गरिमा सिंह, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नूतन चौहान, अपर सिविल जज सी.डि. फरहीन खान, अपर्णा सिंह, अखिल चौधरी, रश्मि सिंह, सिविल जज अंशिका लाल, सिविल जज जू.डि. गगनदीप, मोनू, आजम रहमानी, शाम कुमार, न्यायिक अधिकारी राजीव कुमार पाल, न्यायिक मजिस्ट्रेट फौजिया जहां, न्यायिक मजिस्ट्रेट रूबी सिंह के अलावा डिप्टी कलेक्टर धु्रव शुक्ला, अपर पुलिस अधीक्षक अरूण कुमार, क्षेत्राधिकारी नगर संतोष कुमार, परियोजना निदेशक सत्येंद्र कुमार, उप कृषि निदेशक नरेन्द्र कुमार त्रिपाठी, जिला समाज कल्याण अधिकारी अशोक कुमार, जिला पंचायत राज अधिकारी अवधेश कुमार सिंह, जिला दिव्यांगजन शिवशक्तिकरण अधिकारी राजेश बघेल, जिला कार्यक्रम अधिकारी अशोक कुमार जिला प्रोबेशन अधिकारी राजनाथ राम, बाल विकास परियोजना अधिकारी हरिओम बाजपेई, उप क्षेत्रीय वनाधिकारी राजीव दीक्षित, सहित अन्य संबंधित अधिकारी आदि उपस्थित रहे।

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